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Saturday, March 24, 2012

कुछ न माँगूँ (हाइकु)


1
 कुछ न माँगूँ        
बस पल दो पल
ख़ुशी के सिवा
2.
कभी ढूँढ़ती
यादों के आँगन में
ख़ुशी अपनी
3
बिन बुलाए,
ये गम पता नहीं
क्यों चले आए !
4 .
मैं हूँ पगली 
ढूंढने चली ख़ुशी 
यूँ गली-गली 
5 .
ख़ुशी तो बैठी 
कहीं दुबक कर 
मेरे दिल में 
6 .
ओ मेरी ख़ुशी 
तुझे काहे का डर
तू बाहर आ 
7 .
गमों की रात
जब करती कब्जा
वो पल रूठा 
8 .
गम के गीत 
एक अकेला मन
कैसे हो जीत
9 .
दिल ज्यों गाए
प्रीत-मधुर गीत 
तभी हो जीत 
10 .
गम का साया 
खुशियों की धूप में 
टिक न पाया 

--डॉ. हरदीप कौर सन्धु



Sunday, March 18, 2012

दीवार में कील ( प्रेरक कथा)


जब जागे तब सवेरा भाग -2 ( कहानीकार -डॉ. हरदीप कौर सन्धु)
                                    *****************
यह लघुकथा हिन्दी के कहानी संग्रह 'जब जागे तब सवेरा' में जल्दी ही आ रही है ।



                                                    दीवार में कील
गुरदेव सिंह जिसे सभी देबा फौजी कहकर बुलाते थे , अपनी फ़ौज की नौकरी पूरी होने के उपरान्त अब गाँव में ही रहने लगा था | गुसैला व् अड़ीअल सुभाव के कारण सभी देबे से दूर ही रहते | गुस्सा तो हरदम उसकी नाक पे बैठा रहता | बोलने लगा वो कोई बड़ा-छोटा न देखता , बस जो मुँह में आया बोल देता |परन्तु कोई भी उसके आगे न बोलता | देबे को लगता कि सभी उससे डरते हैं |
आज बातों-बातों में उसका २०-२२ वर्ष का लड़का सीरा न जाने किस बात पर अपने पिता से झगड़ पड़ा और पिता को ऊँचा - नीचा बोल गया |देबे का दिल छलनी-छलनी हो गया परन्तु वह गुस्सा अन्दर ही पी गया | अपनी गलती का अहिसास होने पर लड़के ने पिता से क्षमा भी माँगी मगर गुरदेव सिंह खामोश था |आज उसको पहली बार आपने उम्र भर बोले कड़वे शब्द तथा गुसैले सुभाव का अहिसास हुआ |
 " भापा अब तो मैंने माफ़ी भी मांग ली ....अभी भी नाराजगी है क्या .." सीरे ने पिता की ख़ामोशी को तोड़ना चाहा | " जो तुम चाहते हो बस वैसा ही होगा ...तेरी हर सज़ा मुझे मंजूर है .." सीरे ने फिर मिनत की | 
" पुत्र, सज़ा तो कैसी ? पर अगर तू मेरी माने तो ऐसा कर ...तू जा अपने बाहरवाले घर ....और पिछली दीवार पर कुछ कीलें ठोक कर आ ...बाकी का काम मैं तुझे फिर बताता हूँ |" अपनी दिमागी उलझन को खुद सुलझाते हुए देबे ने अपना फौजी फ़रमान सुना दिया |
सीरे ने साइकल उठाई और बाप का हुक्म की तामील करने चल पड़ा बाहरवाले घर को |दो घंटों के उपरान्त जब वह पसीने से तर-बतर लौटा तो पिता ने वही कील उखाड़ने के लिए उसे फिर से भेज दिया |सीरे को थोड़ी खीज आई मगर अपने हाव- भाव छुपता वह उसी समय बिना कुछ बोले चुप-चाप लौट गया , कीलें उखड़ने | इसी तरह ठोकने-निकालने में पूरा दिन निकल गया |
" भापा...एक बात पूछूँ" शाम को सीरे ने थोड़ा हिचकचाते अपने पिता से अपने दिल की शंका ज़ाहिर की, " आज तूने मुझे ये अच्छे काम लगाया ....कभी जी रे चिड़िया ...कभी मर चिड़िया ....कभी कीलें ठोक तो कभी उखाड़ "| गुरदेव सिंह कुछ न बोला और सीरे की पीठ थपथपाते उसको अपने साथ बाहरवाले घर चलने का इशारा किया |
उसी दीवार के पास पहुंचकर देबे ने कुछ गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया , " आज मैं तुझे जिन्दगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने जा रहा हूँ | जिसका अहिसास मुझे बहुत देर पहले हो जाना चाहिए  था | परन्तु मैंने तो पूरी उम्र निकल दी बिन समझे | मैं नहीं चाहता कि मेरा पुत्तर भी वही गलती दोहराए| " भापा ये क्या बुझारतें सी डाली जा रहा है ....सीधे -सीधे बता ...कहना क्या चाहता है तू मुझे ?" सीरे ने थोड़ा उत्सुक्त होकर पूछा |
    देबे ने सीरे को गलबहियाँ लेते कहना शुरू किया , " पुत्तर ...आज तूने पहले कीलें दीवार में ठोकीं...यह तेरी की गलती है ...मुझे कड़वा बोलना | फिर तूने कीलें निकाली..यह तेरा क्षमा मांगना है | पर ज़रा ध्यान से तू दीवार को देख ..." देबे ने दीवार की तरफ संकेत करते हुए अपनी बात ज़ारी रखी , " चाहे तूने सभी कीलें निकाल दीं...मगर दीवार पर अभी भी उनके निशान बाकी हैं | तू चाहे किसी से कड़वा बोलकर क्षमा भी मांग ले मगर तेरे कड़वे शब्दों के धब्बे जो दूसरे के मन पर लग गए हों उनको कैसे मिटाएगा? मैं ये नहीं कहता कि तू गलती करके अब क्षमा मांगना भी छोड़ दे |छोटी - छोटी गलतियों कि क्षमा मिल सकती है परन्तु एक बार किसी को कड़वा बोलना सौ गलतियों समान है | कड़वे बोल वो अन्दर के जख्म देते हैं जो तमाम उम्र ठीक नहीं होते |बस आज से एक बात याद रखना कि किसी को कड़वा नहीं बोलना |
    पुत्तर को समझाकर देबे को जैसे मानसिक सकून मिला क्योंकि मन ही मन में उसने अपनी गलती सुधार ली थी | उस दिन के बाद लोगों ने देबे फौजी में एक बड़ा बदलाव देखा |अब वह मोम सा नर्म व् मिठास की मूर्त बन गया था और देबे फौजी से लोगों का चहेता फौजी गुरदेव सिंह |

  

Friday, March 9, 2012

मेरा वजूद (चोका)


    हूँ भला कौन 
   क्या वजूद है मेरा 
    यही सवाल 
   आ डाले मुझे घेरा 
   टूटे सपने 
   जब मुझे डराएँ
   मेरा वजूद 
   कहीं गुम हो जाए 
   दूर गगन 
   चमकी ज्यों किरण 
   अँधियारे में 
   सुबह का उजाला 
   घुलने लगा 
  जख्मी हुए  सपने 
 आ चुपके से 
 किए ज्यों आलिंगन 
 सुकून मिला 
 मेरा वजूद मिला 
 मैं तो चाँद हूँ 
गम के बादलों में 
 था गुम हुआ 
मिला सूर्य संदेश
मैं धन्य हुआ
करूँ तुमसे वादा
तुम जैसा ही 
एक काम करूँगा
तुम करते 
दिन में ही उजाला 
मैं उजियारी
हर  रात करूँगा 
हर बात करूँगा 
हरदीप 

Friday, March 2, 2012

जन्मदिन *


हमारे घर आई एक नन्हीं परी 

कितनी भोली और मासूम सी 

फूलों जैसे खिला है चेहरा

खिल-खिला वह हँसती है

कद से वह लम्बी दिखती 

अभी भोली बातें करती है 

भर ओक  बाँटे वह खुशियाँ 
दुःख कभी न आएँ अंगना
हर पल एक नई  सौगात बन जाए 
जिन्दगी सतरंगी कायनात बन जाए 

रहे भरता सदा रब 

उसकी तमन्नाओं की पिटारी को 

चल काला टीका लगा दूँ 

कहीं नजर न लग जाए 

मेरी परियों जैसी धी -रानी को 

-डॉ हरदीप कौर सन्धु   

* सुप्रीत( मेरी बिटिया ) का आज जन्मदिन है ।  वह आज 13  वर्ष की हुई है 

Thursday, March 1, 2012

अविराम के जनवरी 2012 अंक में मेरे हाइकु

                                                       अविराम वेब पत्रिका का लिंक 



त्रिंजण और अनुभूति


अनुभूति वेब पत्रिका पर 27  फरवरी 2012  को मेरे कुछ हाइकु जिनको  मैंने त्रिंजण  में बाँधा है , प्रकाशित हुए हैं । त्रिंजण शब्द पंजाब की लोक संस्कृति से जुड़ा शब्द है। 
 यह संसार भी एक त्रिंजण  है........
 हमारा मन भावों का त्रिंजण है.....
आज मैं इसी जग त्रिंजण तथा मन त्रिंजण की बात अपने हाइकुओं में कहने जा रही हूँ। आशा है आपको यह प्रयास अच्छा लगेगा।




मन त्रिंजण
जीवन भाव काते
बने हाइकु

मन त्रिंजण
सदियों से बंजारा
घूमे आवारा

मन त्रिंजण
खुदा करे निवास
काहे का डर

मन त्रिंजण
ज्यों प्रभु लौ जगाए
शांति हो जाए

मन त्रिंजण
निचोड़े जो चाँदनी
पी नयनों से

ये मुलाकातें
मन त्रिंजण मेले
संदली रातें

त्रिंजण मन
लगा भावों का मेला
नहीं अकेला

भाग्य से हम
देखने आए यहाँ
जग -त्रिंजण

कात रे मन
जगत त्रिंजण में
मोह का धागा
१०
यह जीवन
जगत त्रिंजण का
खेल तमाशा
११
बाँट रे ज्ञान
संसार त्रिंजण में
कर तू दान
१२
जग त्रिंजण
नहीं जागीर तेरी
घड़ी का डेरा
१३
जग त्रिंजण
ये बाग़ वो जिसका
रब है माली
१४
जग त्रिंजण
अनजान नगरी
कहाँ ठिकाना
१५.
जग त्रिंजण
गिनती के हैं साँस
बेगाना धन

अनुभूति लिंक (२७ फरवरी २०१२)

इसी लिंक पर आदरणीय हिमांशु जी की ये टिप्पणी जिसके लिए मैं उनका तहे दिल से शुक्रिया करती हूँ .........
Comments: 'त्रिंजण'के माध्यम से डॉ सन्धु जी ने हाइकु जैसे छन्द में यह अभिनव प्रयोग किया है । हम अपने जिन लौकिक शब्दों और उसमें गुम्फित अर्थ को भूलते जा रहे है, उसे बी याद दिलाया गया है । हिन्दी क्षेत्र ( पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में यह शब्द 'तीजन' के रूप में गाँवों में बोला जाता रहा है । चर्खे का चलन बन्द हो गया तो शब्द भी गायब होने लगा है । इस प्रस्तुति के लिए सन्धु जी बधाई की पात्र हैं । सम्पादक मण्डल तो बधाई के हक़दार हैं ही ....रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


हरदीप