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Friday, March 9, 2012

मेरा वजूद (चोका)


    हूँ भला कौन 
   क्या वजूद है मेरा 
    यही सवाल 
   आ डाले मुझे घेरा 
   टूटे सपने 
   जब मुझे डराएँ
   मेरा वजूद 
   कहीं गुम हो जाए 
   दूर गगन 
   चमकी ज्यों किरण 
   अँधियारे में 
   सुबह का उजाला 
   घुलने लगा 
  जख्मी हुए  सपने 
 आ चुपके से 
 किए ज्यों आलिंगन 
 सुकून मिला 
 मेरा वजूद मिला 
 मैं तो चाँद हूँ 
गम के बादलों में 
 था गुम हुआ 
मिला सूर्य संदेश
मैं धन्य हुआ
करूँ तुमसे वादा
तुम जैसा ही 
एक काम करूँगा
तुम करते 
दिन में ही उजाला 
मैं उजियारी
हर  रात करूँगा 
हर बात करूँगा 
हरदीप 

11 comments:

सहज साहित्य said...

तुम करते
दिन में ही उजाला
मैं उजियारी
हर रात करूँगा
हर बात करूँगा । यह हुई न बात । सूर्य तो दिन में ही उजाला करता है । रात में उजाला करना बहुत बड़ी बात है । इस बड़ी बात को कोई बड़ा कवि ही कह सकता है और शब्दों में बाँध सकता है । डॉ हरदीप जी की यही विशेषता है कि नई उद्भावना के साथ एक दम ताज़ादम बात दिल को छूती हुई । चोका में रंग भरने के लिए बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कुछ कर गुजरने की चाहत ... आशा की दिशा दिखती अच्छी प्रस्तुति

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक रचना...

Udan Tashtari said...

Bahut sunder...

रविकर said...

भावों का सुन्दर प्रगटीकरण ।।

शुभकामनायें |

शिखा कौशिक said...

sarthak prastuti .aabhar
KAR DE GOAL

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

वाह! सुन्दर रचना...
सादर बधाई.

shashi purwar said...

namaskar hardeep ji , himanshu ji .....aapke blog par aana sukhad anubhav raha . happy holi to you and your family

shashi purwar.

expression said...

बहुत खूबसूरत........
सादर.

सहज साहित्य said...

शशि जी यह बहन हरदीप जी का ब्लाग है ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आज 31/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!