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Sunday, March 18, 2012

दीवार में कील ( प्रेरक कथा)


जब जागे तब सवेरा भाग -2 ( कहानीकार -डॉ. हरदीप कौर सन्धु)
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यह लघुकथा हिन्दी के कहानी संग्रह 'जब जागे तब सवेरा' में जल्दी ही आ रही है ।



                                                    दीवार में कील
गुरदेव सिंह जिसे सभी देबा फौजी कहकर बुलाते थे , अपनी फ़ौज की नौकरी पूरी होने के उपरान्त अब गाँव में ही रहने लगा था | गुसैला व् अड़ीअल सुभाव के कारण सभी देबे से दूर ही रहते | गुस्सा तो हरदम उसकी नाक पे बैठा रहता | बोलने लगा वो कोई बड़ा-छोटा न देखता , बस जो मुँह में आया बोल देता |परन्तु कोई भी उसके आगे न बोलता | देबे को लगता कि सभी उससे डरते हैं |
आज बातों-बातों में उसका २०-२२ वर्ष का लड़का सीरा न जाने किस बात पर अपने पिता से झगड़ पड़ा और पिता को ऊँचा - नीचा बोल गया |देबे का दिल छलनी-छलनी हो गया परन्तु वह गुस्सा अन्दर ही पी गया | अपनी गलती का अहिसास होने पर लड़के ने पिता से क्षमा भी माँगी मगर गुरदेव सिंह खामोश था |आज उसको पहली बार आपने उम्र भर बोले कड़वे शब्द तथा गुसैले सुभाव का अहिसास हुआ |
 " भापा अब तो मैंने माफ़ी भी मांग ली ....अभी भी नाराजगी है क्या .." सीरे ने पिता की ख़ामोशी को तोड़ना चाहा | " जो तुम चाहते हो बस वैसा ही होगा ...तेरी हर सज़ा मुझे मंजूर है .." सीरे ने फिर मिनत की | 
" पुत्र, सज़ा तो कैसी ? पर अगर तू मेरी माने तो ऐसा कर ...तू जा अपने बाहरवाले घर ....और पिछली दीवार पर कुछ कीलें ठोक कर आ ...बाकी का काम मैं तुझे फिर बताता हूँ |" अपनी दिमागी उलझन को खुद सुलझाते हुए देबे ने अपना फौजी फ़रमान सुना दिया |
सीरे ने साइकल उठाई और बाप का हुक्म की तामील करने चल पड़ा बाहरवाले घर को |दो घंटों के उपरान्त जब वह पसीने से तर-बतर लौटा तो पिता ने वही कील उखाड़ने के लिए उसे फिर से भेज दिया |सीरे को थोड़ी खीज आई मगर अपने हाव- भाव छुपता वह उसी समय बिना कुछ बोले चुप-चाप लौट गया , कीलें उखड़ने | इसी तरह ठोकने-निकालने में पूरा दिन निकल गया |
" भापा...एक बात पूछूँ" शाम को सीरे ने थोड़ा हिचकचाते अपने पिता से अपने दिल की शंका ज़ाहिर की, " आज तूने मुझे ये अच्छे काम लगाया ....कभी जी रे चिड़िया ...कभी मर चिड़िया ....कभी कीलें ठोक तो कभी उखाड़ "| गुरदेव सिंह कुछ न बोला और सीरे की पीठ थपथपाते उसको अपने साथ बाहरवाले घर चलने का इशारा किया |
उसी दीवार के पास पहुंचकर देबे ने कुछ गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया , " आज मैं तुझे जिन्दगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने जा रहा हूँ | जिसका अहिसास मुझे बहुत देर पहले हो जाना चाहिए  था | परन्तु मैंने तो पूरी उम्र निकल दी बिन समझे | मैं नहीं चाहता कि मेरा पुत्तर भी वही गलती दोहराए| " भापा ये क्या बुझारतें सी डाली जा रहा है ....सीधे -सीधे बता ...कहना क्या चाहता है तू मुझे ?" सीरे ने थोड़ा उत्सुक्त होकर पूछा |
    देबे ने सीरे को गलबहियाँ लेते कहना शुरू किया , " पुत्तर ...आज तूने पहले कीलें दीवार में ठोकीं...यह तेरी की गलती है ...मुझे कड़वा बोलना | फिर तूने कीलें निकाली..यह तेरा क्षमा मांगना है | पर ज़रा ध्यान से तू दीवार को देख ..." देबे ने दीवार की तरफ संकेत करते हुए अपनी बात ज़ारी रखी , " चाहे तूने सभी कीलें निकाल दीं...मगर दीवार पर अभी भी उनके निशान बाकी हैं | तू चाहे किसी से कड़वा बोलकर क्षमा भी मांग ले मगर तेरे कड़वे शब्दों के धब्बे जो दूसरे के मन पर लग गए हों उनको कैसे मिटाएगा? मैं ये नहीं कहता कि तू गलती करके अब क्षमा मांगना भी छोड़ दे |छोटी - छोटी गलतियों कि क्षमा मिल सकती है परन्तु एक बार किसी को कड़वा बोलना सौ गलतियों समान है | कड़वे बोल वो अन्दर के जख्म देते हैं जो तमाम उम्र ठीक नहीं होते |बस आज से एक बात याद रखना कि किसी को कड़वा नहीं बोलना |
    पुत्तर को समझाकर देबे को जैसे मानसिक सकून मिला क्योंकि मन ही मन में उसने अपनी गलती सुधार ली थी | उस दिन के बाद लोगों ने देबे फौजी में एक बड़ा बदलाव देखा |अब वह मोम सा नर्म व् मिठास की मूर्त बन गया था और देबे फौजी से लोगों का चहेता फौजी गुरदेव सिंह |

  

8 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बच्चों की पाठ्य पुस्तक में शामिल होनी चाहिए यह प्रेरक कथा। बहुत बधाई।

kshama said...

Bahut badhiya kahanee!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 19-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

शिखा कौशिक said...

badhai ....bahut khoob ...मिशन लन्दन ओलंपिक हॉकी गोल्ड

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा एवं प्रेरक!!

Anupama Tripathi said...

ati uttam prarak katha ...!!
bahut achchhi lagi ...!!

Dr (Miss) Sharad Singh said...

रोचक प्रेरक कथा...

सदा said...

प्रेरक प्रस्‍तुति ।