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Wednesday, April 4, 2012

परनानी के आँसू और अनुत्तरित प्रश्न"




आज भी  कदे ना कदे मेरे चेतिआं (यादों )'च वसदी मेरी पड़नानी (जिसे  मैं नानी  बुलाउंदी सी ) मेरे नाल गलां ( बातें)करन लगदी है । छोटे हुदिआं नू ओह सानू 'बार' दीआं गलां सुणाउंदी ते उथे इक वार जा के आपणा पुराणा पिंड (गाँव) वेखण दी इछा जाहर करदी ।इह “सांदल बार“ दा इलाका सी जो अजकल पाकिसतान दा मानचैसटर (City of Textile) अखवाउंदा है । मेरा नानका परिवार भारत -पाकि दी वंड (बटवारा ) तों पहिलां ओथे चक नम्बर  52, तहिसील समुंदरी , ज़िल्हा लाइलपुर विखे रहिदा सी ते मेरी पड़नानी दा  पिंड  सीतला सी।



साडे कोल़ मिलण आई पड़नानी कई-कई महीने ला जांदी। मेरे डैडी ने कहिणा, "जुआको... इह मेरी बेबे आ। इह थोडी मां दी मां दी मां है। बेबे तों कुझ सिखो... बेबे दीआं गलां(बातें ) धिआन नाल़ सुणिआ करो। बेबे दी सेवा करिआ करो।"



ओदों नानी दीआं सुणाईआं बातां तों बगैर चाहे बहुतीआं गलां दी सानू समझ वी ना आउंदी पर फेर वी असीं नानी दीआं गलां बड़े गहु(ध्यान ) नाल सुणदे... ते नानी फेर की होइआ... फेर की होइआ... कहि-कहि के ओस दीआं कदे ना मुकण वालीआं 'बार' दीआं गलां दी लड़ी नू होर लमेरा कर दिंदे  । गलां करदी नानी दीआं अखां 'चों आप मुहारे हंझू (आंसू ) वहि तुरदे । असीं निआणे आपणी समझ अनुसार नानी नू हौसला दिंदे  कहिंदे  "लै... नानी भला तू रोंदी किओं हैं... हो लैण दे सानू वडे... फेर असीं तैनू तेरे पिंड लै के चलांगे ।"




इक दिन जदों मैं आवदी सहेली नाल मूहरले बरांडे 'च बैठी आवदा सकूल दा कम कर रही सी तां कोल बैठी गलोटे अटेरदी नानी ने मेरे कोल खिलरे कागजां वल इशारा करदी ने पुछिआ, "कुड़े... आ भला भारत दा नशका आ ?"


मेरी सहेली ने हैरान हो के किहा , “बेबे भला तैनू किवें पता बई इह भारत दा नक्शा है ।"
“......लै पुत तां की होइआ, जे मैं थोडे आंगू (आपकी तरह ) पड़्ही वी नी... पर थोनू नित वेहदी (देखती)आं... पड़्हदीआं नू॰... गलां करदीआं नू जदों तुसीं 'जादी ( आज़ादी ) बारे पड़्हदीआं ओ ।”




नानी ने आवदी मलमल दी चुनी (चूनर) दा पल्ला  ठीक करदिआं फेर ओसे नकशे वल इशारा करदिआं कहिणा शुरू कीता, "पुत, 'जादी दी ओह पड़्हाई तां थोनू अज ताईं किसे ने पड़्हाई ई नी... जिहड़ी असीं आवदे पिंडे (तन ) 'ते हंडाई (झेली )आ । जै खाणिआं ने पकीआं लखीरां वातीआं एहनां कागतां 'ते... नाल़े साडीआं जमीनां 'ते... इको मुलख दे करते दो टोटे... बणा ता इक हिन्दोस्तान... ते दूजा पाकिसतान... भैण-भाईआं आंगू रहिदिआं नू अड(अलग )करता सानू ।"




नानी हमेशां वांग आपणे अतीत 'च गुआच गई । “...पुत सन संताली (1947 ) दे ओहनीं दिनीं रौला पै गिआ बई 'जादी ( आज़ादी) आ गी... 'जादी आ गी... हुण सानू मुलख(देश ) छडणा पैणा । असीं सारे इओं हरान... बई एह काहदी 'जादी आ... जिहड़ी सानू मुलख छड के मिलणी आ। 'जादी काहदी आई सी... पुत... निरी लुट सी लुट... सानू इओं तां पता नी सी बई जाणा किथे आ? ...घरों बेघर करता सी एस खसमां खाणी 'जादी ने । सानू तां एही संसा (चिंता ) वढ-वढ खाई जावे... बई हुण जुआन धीआं/नूहाँ (बेटी/बहु) ते निके-निआणिआं (छोटे बच्चे )नू किथे (कहाँ )लै के जावांगे? कदे लगे... बई ऐवें रौल़ा ई आ... ख़बरे कोई भूचाल़ आउण तों पहिलां कोई ठुमणा लग ई जावे।"




डांग जिडा हाउका (लम्बी साँस ) भर के नानी ने आवदी गल जारी रखदिआं किहा, "...नाल़े एह 'जादी की थोडे भा दी 'कली (अकेली ) ई आ गी सी... ना पुत... ना... इह कल़मूही तां आवदे नाल़ विछोड़े दा दुख ते ओह गहरे  फट(जख्म ) लिआई सी जिहड़े अज ताईं नी भरे। इहनां फटां 'ते मल्हम-पट्टी  तां किसे ने की धरनी सी... एह तां अज ताईं किसे ने देखे बी नी।"




हौल़ी-हौल़ी गलां करदी नानी दी बिरती अज फेर एथों मीलां दूर ओस दे पिंड सीतला ( हुण पाकिसतान 'च ) नाल़ जुड़ गई सी। "...लै है... भरिआ भकुनिआ घर सी साडा... जिहड़ा असीं पता नहीं किहड़े हालीं छड के तुरे सी। इह तां पुत ताईं पता लगू जे मेरे अरगे बुड़े-बुड़ीआं दा चित(मन ) फरोल़ के देखोंगीआं । ...बलां ई वडा घर... खुल्हा-डुला निमां-डेकां नाल़ भरिआ विआ विहड़ा... इक पासे वडी सबात... मूहरे रसोई ते बरांडा... दूजे पासे पक्की  बैठक... सबात 'च पुत मैं तां ओमे-जिमे पितल़ नाल़ मड़्हिआ सन्दूक छड आई... हथीं कते-बुणे दरीआं-खेसां नाल़ भरिआ विआ । रीझां ला के लिपिआ समिआरिआ चुल्हा-चौंका... ओटे ते पाईआं तोते -मोरनीआं मैनू अज बी ओमे-जिमे दीहदे (दिखाई )ने। ...मार घर भरिआ पिआ सी लवेरीआं नाल़... दो बलदां दी जोड़ीआं... बोता... कटरू-वछरूआं नाल़। पुत मैं की-की गणामां थोनू हुण ।"


ठंडा  साह भरदिआं नानी ने आवदी गल जारी रखी, "...जमां ई समझों बाहर दी शैअ सी एह खसमां खाणी 'जादी...।


पुत मैनू तां कई-कई बार हुण बी ओही 'वाजां कनी पैंदीआं ने... जदों गुआंढीआं दा मुंडा (लड़का ) बीरा घाबरिआ विआ बाहरों भजिआ आइआ ते आखे... ओए भज लो जे भज हुदा.(दौड़ लो अगर दौड़ा जाता है ).. आपणी पती (मोहल्ला ) नू॰ बी वढण आ गे ओह । ...ते ओधरों होर बी डराउणीआं 'वाजां औण... ओ जाण ना दिओ इन्हां नू॰ सुके एथों... कर दिओ डकरे (टुकड़े )ऐथे ई । भाई... जिनां कु समान घरों चकिआ गिआ... गडिआं 'ते लद लिआ... की-की धर लैंदे नाल़े असीं... मसां भज के जानां बचाईआं। ओदों तां लगे खबनी(शायद ) लोट(ठीक ) ई हो जू सारा कुछ... खबनी मुड़ ई पमांगे घरां नू॰... चन्दरा  रब बी पता नी किहड़े माड़े करमां दा बदला लै रिहा सी साथों। की पता सी ओन्हां घरां दा मुड़ मूह बी देखण नू नी मिलणा।"


नानी ने आवदी ऐनक दी डडी नू मरोड़ी दिंदे  आवदी गल चालू रखदिआं किहा, "....‘ते फेर लहू पीणीआं नगीआं तलवारां ते बरछे घरां 'च वढ-टॱक करन ॱगे। सानां आंगू भूतरे लोक इक दूजे दे दुशमण बणगे सी। भाई-भाई... सिखड़े ते मुसले बणगे सी। बाबे नानक ते पीर-पगबरां दी धरती रत(खून ) नाल़ लालो-लाल हो गी सी। पिडो-पिडी जिहड़ा घाण होइआ सी मनुखता दा... पुत देखिआ नी सी जांदा । हाहाकार मची वी सी चारे पासे... ओधर वसदे हिन्दू  ते सिख एधर नू भजे... ‘ते एधरों मुसलमान ओधर नू । ...ते फेर लोथां (लाशें ) नाल़ भरीआं गडीआं... ओधरों एधर... ते एधरों ओधर नू गईआं। लोथां दे ढेर लग गए सी । ओह इक खूनी हिजरत हो निबड़ी सी।




धीआं - भैणां दी इज़त सरेआम नीलाम होई सी। गडिआं 'ते तुरे जांदिआं नू बी इही संसा ... बई पता नी किधरों हमला होजूगा... धीआं भैणां नू खोह के लै जाणगे ओह । ...ते कईआं ने तां ढिडों जमीआं दी इज़त बचाउण लई... आवदीआं धीआं-भैणां नू आवदे हथीं आप किरपानां नाल़ वढता सी... कईआं ने आवदीआं जिओंदीआं कुड़ीआं नू नहिरां 'च रोड़ता सी। ओदों तां साडा रब बी नी सी बौहड़िआ... ओह बी पता नी डर के किहड़ी काल-कोठड़ी 'च लुक के जा बैठा सी।"


"...ते मगरों एधर आ के कई तां जमां ई चुप करगे... कईआं नू मैं कमल़े होए देखिआ... आवदे टबर(परिवार ) नू... आवदीआं धीआं-भैणां नू आवदे हथीं मार के कोई किमे जिओं लऊगा (कैसे कोई जिन्दा रहा सकता है )भला... मन 'ते पिआ बजन अगल़े नू कमल़ा नी करू तां होर की करू?' ...ते पुत आवदा मुलख छडणा की सौखाल़ा पिआ नाल़े...।" नानी दीआं अखां 'चों धरल़-धरल़ अथरू वहि रहे सी। ओसने आवदी चुनी दे पले नाल़ अखां पूझीआं ते नाल़े आवदी ऐनक नू......फेर ओह वडे दरवाज़े वल इओं देखण लगी जिवें पूझी (साफ)  होई ऐनक विचों दी उहनू दरवाजे दे परले पासे सीतला पिंड  नू जांदा खवनी कोई राह ही खौरे दिख जाए।




नानी दीआं गलां सुणदे... असीं ऐना डर गए सी कि हुन्गारा भरना वी भुल गए सी... निआणी मत (समझ) नू समझ वी नहीं सी आ रिहा नानी किनां नू वार-वार कहि रही सी... बई 'ओह' आ जाणगे... आखिर कौण सन ओह? ...जिना ने ऐनी दहिशत पाई सी लोकां 'च।




आवदा पिंड  फिर तों दुबारा वेखे बिनां ही नानी तां कुझ सालां बाद एस फानी दुनीआं नू अलविदा कहि गई... पर अज ओस दे हंझू  मेरीआं अखां राहीं वहि रहे ने ते मेरे कोल़ तां हुण नानी दी मलमल दी चुनी वी नहीं है जिस नाल़ मैं अखां पूंझ के आवदे नानकिआं दी 'सांदल बार' ते नानी दे सीतला पिंड  नू वेख सकां ।






हरदीप


*चित्र गूगल के आभार से 













3 comments:

सहज साहित्य said...

पड़नानी के सवाल आज भी मुंहबाए हमारे सामने खड़े हैं । उसके बहते गरम आंसू ,। पीछे छ्टी जन्म भूमि , मारकाट लूट खसोट , बलात्कार , और यह हैरानगी -‘’असीं सारे इओं हरान... बई एह काहदी 'जादी आ... जिहड़ी सानूँ मुलख छड्ड के मिलणी आ। 'जादी काहदी आई सी... पुत्त... निरी लुट्टट सी लुट्टट... सानूँ इओं तां पता नी सी बई जाणा कित्थेथे आ? ...घरों बेघर करता सी एस खसमां खाणी 'जादी ने । ‘’ आम आदमी को इस आज़ादी ने क्या दिया? जो दिया वह केवल सन्ताप है । गर्म-गर्म आँसू कभी न थमने वाले ! दिए बहुत सारे सवाल जिनका आज़ादी के 65 साल होने को आए , पर जवाब नहीं मिला है । घर उजाक़्ड़कर कौन-सी आज़ादी मिलती है ।

इस हृदय विदारक हालता को देखकर भगवान भी किसी कालकोठरी में छिपकर बैठ गया होगा , वह भी किसी का दु:ख दूर करने के लिए बहीं बहौड़ा॥ इस दर्द को देखिए

-‘’धीआं - भैणां दी इज़्ज़्त सरेआम नीलाम होई सी। गड्डिआं 'ते तुरे जांदिआं नूं बी इही संसा... बई पता नी किधरों हमला होजूगा... धीआं भैणां नूं खोह के लै जाणगे ओह । ...ते कईआं ने तां ढिड़डों जंमीआं दी इज्जत बचाउण लई... आवदीआं धीआं-भैणां नूं आवदे हत्थीं आप किरपानां नाल़ वढ्ढता सी... कईआं ने आवदीआं जिओंदीआं कुड़ीआं नूं नहिरां 'च रोड़ता सी। ओदों तां साडा रब्ब बी नी सी बौहड़िआ... ओह बी पता नी डर के किहड़ी काल-कोठड़ी 'च लुक्क के जा बैठा सी।"

सबके दुखों का सार यह है कि हमने देश के टुकड़े तो कर दिए, साथ ही इन्सानियत को भी बेआबरू कर दिया । जन सामन्य की पीड़ा न पहले सुनी जाती थी , न अब । इस विभाजन की जो भेंट च।ध गए उनका मुकदमा दुनिया की किस अदालत में लड़ा जाएगा ? कौन-सा मानवाधिकार आयोग उसका फ़ैसला देगा ? कौन उसका हर्ज़ाना देगा । उस परनानी के आंसू , अपना गाँव छुट जाने का हौदका , कितना रुलाता होगा ? बेकसूरों की लाशों के ऊपर से चलकर आई आज़ादी , कभी भी आज़ादी नहीं है । अगर यह आज़ादी होती तो देश को लूटने वाले इन भारतीय काले अंग्रेज़ों को फ़ाँसी दे दी गई होती । अपनी कुर्सियाँ बचाने के लिए आज भी जाति -धर्म, मज़हब का ज़हर फैलाकर लोगों की रोटी -रोज़ी , इज़्ज़त। अमन -चैन हलाक़ हो रहे हैं ।

हरदीप सन्धु चित्रकारी में पारंगत है । यह संस्मरण कलेजे पर हाथ रखकर पढ़ा । वह विचारधारा और राजनीति, जिसने मज़हब के नाम पर देश का बँटवारा कराया और मंजूर किया , भारत और पड़ोस सभी को सदा अभिशप्त करती रहेगी । बहन हरदीप जी आपको इस प्रभावी चित्रण के लिए बहुत बधाई ! आपकी क़्लम इसी तरह चलती रहे ।

amita kaundal said...

हरदीप जी आपका यह संस्मरण मुझे मेरी दादी और नानी दोनों की कहानियों में ले गया शायद यही कहानियां हैं जिन्होंने मुझे आजादी और वतन का मतलब समझाया था और आज की पीढ़ी इन कहानियों से वंचित है आप बहुत सुंदर लिखती हैं बधाई.
सादर,
अमिता कौंडल

Dr Om Prakash Pandey said...

sachamuch koi ghar to prem se hee bhara-poora banataa hai .