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Sunday, April 22, 2012

सिद्धू -सन्धु जुगलबन्दी

आज मैं प्रोफेसर दविंद्र कौर सिद्धू और अपने हाइकु को लेकर जुगलबंदी पेश कर रही हूँ । आशा करती हूँ ये प्रयास अच्छा लगेगा । 
खोज रे मन 
धरती से आकाश 
तेरा वजूद...............दविंद्र 
खोजा तो पाया
धरा खुला अम्बर 
है मेरी काया............हरदीप 



याद अतिथि 
दरारों से फिसले
साँसों में बसी..........दविंद्र 
सौभाग्य मेरा
आई अतिथि बन 
आज ये यादें..........हरदीप 


फूल बन तू
छोड़ बारूदी बातें
अमन चाह .............दविंद्र 
बातें बारूदी
कर देती तबाह 
अमन फूल.............हरदीप 


बारूद हाथ 
ये नारे अमन के 
छोड़ चालाकी ...........दविंद्र 
होगा  न कभी 
बारूद से अमन 
जान रे मन.............हरदीप 


आग का गोला 
मन में दहकता 
फूल क्या बनूँ ............दविंद्र 
सींचा  मन को 
ज्यों निर्मल ख्यालों से 
बना ये फूल ..............हरदीप 

10 comments:

udaya veer singh said...

ਸੋਣੀ ਜੁਗਲਬੰਦੀ ,ਦੋ ਜ੍ਸਮ ਇਕ ਜਾਣ, ਵਰਗੀ ....ਸੋਣੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਤੋ ਭਰਿਯਾ ,ਹਾਯੀਗਾ ਪਸਾਂਦਾ ਆਯਿਯਾ ਜੀ ਮੁਬਾਰਕਾ ਦੋਹਾਂ ਨੂ /

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर वाह!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 23-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-851 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

सहज साहित्य said...

हरदीप बहन और प्रो द्विन्दर सिद्धू जी के तांका से तैयार जुगलबन्दी बहुत सफ़ल है । भाव=साम्य होने के कारण मन को छू गए सभी हाइकु । जुगलबन्दी का अभिनव प्रयोग हिन्दी हाइकु पर शुरू किया गया था । हाइकु यद्यपि बरसों से लिखे जा रहे हैं , पर जुगलबन्दी की यह परिकल्पना एकदम नई है । दोनों को हार्दिक बधाई !!

Rakesh Kumar said...

यह तो कमाल की जुगलबंदी है.
गंगा जमुना के संगम जैसी.
भावविभोर हो गया है मन इस् संगम
में डुबकी लगा कर

अमिता कौंडल said...

बहुत सुंदर जुगलबंदी है. बधाई,
सादर,
अमिता कौंडल

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर .... सभी हाइकु और गजब की जुगलबंदी .... बधाई

Dr.R.Ramkumar said...

सफल रहा
जीवन का सफर
तुम मिले हो

आपके हाइकू पढ़कर यही लगा कि

Rama said...

डा. हरदीप जी ,
आपकी और सिद्धू जी की हाइकु जुगलबंदी ह्रदय -स्पर्शी और काबिले तारीफ़ है ....आश्चर्य होता कि आप हाइकु में भी इतनी संगीतपूर्ण जुगलबंदी कैसे कर लेते हो ....यह श्रुंखला यूं ही चलती रहे इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...

डा. रमा द्विवेदी

VIJAY KUMAR VERMA said...

बहुत सुन्दर वाह!

मीनाक्षी said...

आज अनायास इधर आना हुआ...आपके लेखन का जादुई चिराग़ जैसे कई नए रूप दिखाता चला गया और हम मंत्रमुग्ध से देखते पढ़ते आत्मसात करते गए...बेहद प्रभावशाली खासकर यह जुगलबन्दी तो लाजवाब लगी....