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Thursday, May 10, 2012

वायदे का हिंडोला


-डॉ हरदीप कौर सन्धु

दीये की बाती से युगों से जान पहचान थी ।  वह एक दूसरे के पूरक जो ठहरे ।  कुछ दिन पहले वे धीमी रौशनी के आँगन में बैठे बातों में उलझे हुए थे ।  बातों-ही बातों में बाती  ने नए दीये के लिए एक वायदे का हिंडोला  बनाया और उसे हिंडोले पर  चढ़कर रौशनी बिखेरने को कहा ।  बहुत तेज़ी से चलने वाले हिंडोले पर चढ़ने के लिए विशेष सावधानी और नियमों के प्रयोग के बारे में भी बाती  नेनए दीये को बताया ।  और फिर दोनों अपने -अपने घर लौट गए ।
                बाती की  मन -तरंगे कहती हैं कि दीये का पूरा मन है इस हिंडोले पर चढ़ने का और वह इसके पास ही खड़ा है ।  उसने कई मर्तबा इस पर चढ़ने की कोशिश भी कीमगर नियमों को भूल गया ।  बाती का मन बेचैन -सा हो उठा .........कहीं चोट ही न लग गई हो उसके प्यारे दीये को !                      
           मगर जिस दिन दीया इस हिंडोले पर चढ़ने में सफ़ल हो गया ,उसे ऐसा  आनन्द मिलेगा ,जिसकी कभी उसने कल्पना भी नहीं की है ।  बाती को उस दिन दुनिया की अनमोल खुशियों की दौलत मिल जाएगी ।  
      वैसे तो बाती ने अभी तलक दीये से कभी कुछ नहीं माँगा ; मगर आज वह अपने आने वाले जन्म दिन पर दीये से इसी दौलत की माँग कर रही है ।  आज बाती दीये को बस इतना ही कहना चाहती है कि अगर कोई अपने  मन से कुछ पाने की कोशिश करे तो पूरी कायनात अपनी भुजाएँ फैलाकर उसको सहारा देने लगती है ।