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Tuesday, October 30, 2012

जिन्दगी -चूल्हे*



जिन्दगी -चूल्हे
खाएँ ज्यों रोटी सेक 
भरता पेट 
इसी जिन्दगी चूल्हे 
पकते भाव 
रूह पाए -खुराक 
जिंदगी -चूल्हे 
दुःख -सुख सुलगें
उठता धुआँ 
मिले  जिन्दगी -चूल्हे 
साँझ का झोका 
मिले प्यार अनोखा 
जिन्दगी- चूल्हे 
हिम्मत का ईंधन
खिलते दिन 
हाय ! ज़िन्दगी -चूल्हे 
ज्यों  फूँककर 
धुआँ उड़ता देखूं 
कभी ज़िन्दगी सेकूँ ।
डॉ हरदीप कौर सन्धु 
*चोका जापानी काव्य शैली की लम्बी कविता है जिस में 5 +7 5 +7 +5  का क्रम होता है और अंत में ताँका [ 5 +7 +5 +7 +7 ] जोड़ दिया जाता है ।
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