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Sunday, February 17, 2013

चुप की नदी (चोका)


चुप की नदी 
बहती एकांत में 
डूबा था मन 
उखड़ा बेचैन - सा 
यूँ हर पल 
पुरज़ोर लहरें 
धकेलें इसे 
न जाने यह कैसे 
धीरे धीरे से 
भीतर ही भीतर 
इन्हें समाता 
गूँगी चुप्पी की जुबाँ 
बोलते हर्फ़ 
मन की दहलीज़ पे 
हौले हौले से 
सँजोकर रखता 
चुप नदी से 

पीता दो घूँट पानी 

रूह की प्यास 
सहेजे ही सहेजे 
मिटाता जाता 
चुप लहरें 
समेट कर लाईं 
हँसी कहीं से 
खिलखिलाती हुई 
बना मिठास 
कानों में है घोलता 
इच्छाओं के 
भरे-भरे  भंडार 
इसी नदी में 
बहाता चला जाता 
नई ज़िन्दगी 
नई नवेली धुने 
इसी चुप्पी से 
छेड़कर ये मन 
राग इलाही गाता !

डॉ हरदीप कौर सन्धु  




Thursday, February 7, 2013

'खूबसूरत हाथ

डॉ हरदीप कौर सन्धु की लघुकथा 'खूबसूरत हाथ' पढ़ने के लिए  इस लिंक पर क्लिक कीजिए