Followers- From 17 May 2010.....'til today

Sunday, February 17, 2013

चुप की नदी (चोका)


चुप की नदी 
बहती एकांत में 
डूबा था मन 
उखड़ा बेचैन - सा 
यूँ हर पल 
पुरज़ोर लहरें 
धकेलें इसे 
न जाने यह कैसे 
धीरे धीरे से 
भीतर ही भीतर 
इन्हें समाता 
गूँगी चुप्पी की जुबाँ 
बोलते हर्फ़ 
मन की दहलीज़ पे 
हौले हौले से 
सँजोकर रखता 
चुप नदी से 

पीता दो घूँट पानी 

रूह की प्यास 
सहेजे ही सहेजे 
मिटाता जाता 
चुप लहरें 
समेट कर लाईं 
हँसी कहीं से 
खिलखिलाती हुई 
बना मिठास 
कानों में है घोलता 
इच्छाओं के 
भरे-भरे  भंडार 
इसी नदी में 
बहाता चला जाता 
नई ज़िन्दगी 
नई नवेली धुने 
इसी चुप्पी से 
छेड़कर ये मन 
राग इलाही गाता !

डॉ हरदीप कौर सन्धु  




12 comments:

सहज साहित्य said...

चुप की नदी ,बहुत अच्छा चोका कविता है । एक -एक शब्द दिल को छू गया । नवम्बर के बाद लम्बी चुप्पी के बाद शब्दों का यह उजाला आग्रत हुआ । आप इसे अपने शब्दों की रौशनी देते रहिए हरदीप जी ! नदी की चुप्पी की तरह आपकी यह चुप्पी पाठकों को बहुत खलती है ।

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति आदरेया -
शुभकामनायें ||

KAHI UNKAHI said...

बहुत खूबसूरत...इतने दिनों बाद आपको यहाँ पाकर बहुत अच्छा लगा...|
प्रियंका

Anita (अनिता) said...

ये चुप की नदी ..... सभी बाँध तोड़कर सीधे दिल में उतर गयी... हरदीप जी!
बहुत ही खूबसूरत भाव गुँधे इस चोका में..
~सादर!!!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपकी यह प्रविष्टि दिनांक 18-02-2013 को चर्चामंच-1159 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

DINESH PAREEK said...

बहुत खूब उत्कर्ष रचना
मेरी नई रचना
फरियाद
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
दिनेश पारीक

डॉ. जेन्नी शबनम said...

चुप की नदी का भाव सहज ही मन को छू गया. कितने जज़्बात समेटे ये चुप... बहुत कुछ कह गया. बहुत सुन्दर चोका, बधाई.

ज्योत्स्ना शर्मा said...


नई ज़िन्दगी
नई नवेली धुने
इसी चुप्पी से
छेड़कर ये मन
राग इलाही गाता ! मौन ने रची बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना ..बहुत बधाई !!

Dr.Bhawna said...

Bahut dino baad likha par eakdam manja hua likha bahut gahan,bahut sunadar bahut-2 badhai...

Rajendra Kumar said...

बहुत ही सुन्दर सार्थक प्रस्तुति.

ज्योति खरे said...


समेट कर लाईं
हँसी कहीं से
खिलखिलाती हुई-----gajab