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Thursday, March 21, 2013

फ्रेम अधूरा


1.
frame-1खाली है फ्रेम 
दीवार पे लटके 
सूना है घर ।
2 .
अपूर्ण फ्रेम 
काँपते हाथों टँगे 
चुप्पी है छाई ।
3 .
 फ्रेम अधूरा
खोई एक तस्वीर 
धूल है जमी ।
4 .
frame-2मौन हैं सब 
खाली फ्रेम बोलता 
दिल डोलता ।
5 .
खाली है फ्रेम 
अँखियाँ  ढूँढ़ रही 
भावी चेहरा  ।

डॉ हरदीप  सन्धु

3 comments:

सहज साहित्य said...

फ़्रेम में जो कुछ जड़ा होता है , वह हमारी स्मृतियों से जुड़ा होता है । फ़्रेम तक इसलिए पहुँचता है कि हम उसको अपनी आँखों के सामने रखना चाहते हैं , एक पल को भी दूर नहीं करना चाहते । खाली फ़्रेम की पीड़ा वही समझ सकता है जो उससे आत्मिक सम्बन्ध रखता हो । कभी फ़्रेम खाली होता है, कभी अधूरा होता है, कभी सब मौन हो जाते हैं : क्योंकि जो फ़्रेम में था , अब नहीं है ।तब खाली फ़्रेम ही पूरा किस्सा कह देता है । आखिर में 'खाली है फ़्रेम'और आँखों को तलाश है उस चेहरे की जो आने वाले समय में उस फ़्रेम का हिस्सा बने । हर हाइकु में खाली फ़्रेम की बात कहने के लिए अलग शब्द पेश किए गए हैं । गम्भीर होकर हाइकु न पढ़ने से लगेगा की हर बार एक ही वाक्यांश दुहरा दिया गया है , जबकि ऐसा नहीं । हर बार शब्दावली बदल गई , अर्थ बदल गए , अर्थ की छटा बदल गई और गहनता भी बदल गई । चौथे हाइकु में मौन और दिल डोलने के भाव को मिलाइए । चुप होना है मुँह से न बोलना , मौन इससे आगे बढ़कर भीतरी चुप्पी को व्याख्यायित करता है । डॉ हरदीप सन्धु के इन सामान्य से लगने वाले ( केवल झटपट पढ़कर अपनी कुछ भी प्रतिक्रिया लिखने वाले को पूरी बात समझ नहीं आ सकती) हाइकु में काव्य -सौन्दर्य की अद्भुत ऊँचाई है । जितनी बार पाठक पढ़ता है , उतनी बार अर्थ की गुत्थियाँ खुलती जाती हैं। इस सार्थक सर्जन के लिए बहुत बधाई !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बोलते शब्द चित्र!

सुखदरशन सेखों said...

एक फ्रेम के अंदर कितने फ्रेम, वाह !