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Wednesday, April 24, 2013

भोर की बेला


1.

सुहानी भोर 
सागर की लहरें 
मचाएँ शोर  
2.
भोर की बेला 
चीं -चीं गाए चिड़िया 
मन अकेला  
3.
भोर किरण 
सिन्दूरी आसमान 
मंद पवन  ।
4.
हँसा सवेरा 
खिड़की से झाँकती 
स्वर्ण रश्मियाँ । 
5.
धीमी पवन 
पँखुरी भरे आहें 
खुशबू मन  ।

डॉ हरदीप सन्धु 
नोट : मेरे ये हाइकु सहज साहित्य पर 21 अप्रैल 2013 को प्रकाशित हुए देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिएगा । 

2 comments:

सहज साहित्य said...

हरदीप जी आपके सभी हाइकु भावपूर्ण होने के साथ -साथ उत्तम काव्य के उदाहरण हैं। बहुत बधाई !

jyoti khare said...

मन में उठते उद्गारों को हाइकू में लिखना सहज नहीं है
आप हाइकू में सार्थक काम कर रहीं हैं
बधाई

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