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Sunday, June 23, 2013

ढूँढ़े साहिल

अपनापन कई बार शब्दों की पहुँच से परे हो जाता है, तो चुप्पी में बदल जाता है । अपने दर्द की खुद को जब  आदत- सी हो जाती  है तो लगता है इसको यहीं छुपा लो ,बिखर गया तो ज्यादा टीस देगा । इसी विषय पर आज हाइकु का गुलदस्ता ,आप सबकी भेंट

1
हाथों से मिटी 
खुशियों की लकीरें 
बिखरा दर्द । 
2
मेरी तन्हाई 
मेरे साथ चलती 
ढूँढ़े साहिल । 
3
छोड़ वजूद 
रेत पर लकीरें 
लौटी लहरें । 
4
शान्त सागर 
बेचैन- सी लहरें 
जख़्मी साहिल । 

5 .
गूंगे हैं शब्द
चीखों के बीच चुप्पी 
शोर पे भारी । 
 
6  .
चुप्पी के बीच 
एक चीख है छुपी 
बहरे कान । 
 
7  .
सन्नाटा छाया 
बाहर से भीतर 
डरता मन । 
 
 
8 .
चीर निकला 
जिस्म का पोर -पोर 
सर्द सन्नाटा । 
 
9 .
सलीब टंगी 
असहाय ख़ामोशी 
मुर्दा सन्नाटा । 




 डॉ हरदीप सन्धु