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Wednesday, May 28, 2014

सुर्ख गुलाब (हाइबन)

डॉ हरदीप कौर सन्धु 

स्कूल ऑफ़ स्पेशल एजुकेशन -"चिल्ड्रन विथ स्पेशल नीड्स " भीतर जाते ही मेरी सोच रुक- सी गई थी .... मैं तो जैसे निष्पन्द  मूर्त्ति बन गई थी और भीतर तक काँप गई थी। 
  आधी छुट्टी का समय था।  बच्चे स्कूल में बने अलग -अलग हिस्सों  में खेल रहे थे ;जो बड़ी -बड़ी ग्रिल लगा कर बनाए हुए थे। एक भाग में कुछ बच्चे व्हील चेयर पर बैठे इधर उधर देख रहे थे। दूसरे हिस्सों में कोई बच्चा ऊँचे से चीख रहा था , कोई दीवार की तरफ मुँह करके छलाँगें लगा रहा था, कोई बेहताशा दौड़ रहा था ,तो कोई ऐसे ही हाथ हिला -हिलाकर बिन शब्दों से अपने -आप से ही बातें कर रहा था।  एक बच्चे मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी ओर खींचने लगा जैसे वह मुझे कुछ बताना चाह रहा हो।
          मुझे विस्मित तथा भयभीत-सी देखकर स्कूल का एक कर्मचारी बताने लगा, " ये बच्चे बोल नहीं सकते। अपने भावों को चिलाकर या आपका हाथ थाम कर प्रकट करते हैं। कुछ बच्चे मुँह द्वारा खा भी नहीं सकते।  उनके  पेट में लगी ट्यूब में  सीधे ही भोजन डाला जाता है।  बहुत से बच्चों को टट्टी -पेशाब का भी पता नहीं चलता। इस स्कूल में इन दिमागी तथा शारीरिक तौर से विकलांग बच्चों को खुद को सँभालने की ही ट्रेनिंग दी जाती है"
          सुनकर मेरी आँखे नम हो गईं। मैं सोचने लगी कि जब किसी के घर में किसी बच्चे का जन्म होने वाला होता है ,तो हर दादी को पोते का इंतजार रहता है। उसने शायद ही कभी ये दुआ की हो कि हे प्रभु आने वाला बच्चा तंदरुस्त हो। मेरी सोच विकलांग बच्चों तथा इनके माता-पिता पर आ कर अटक गई
        चढ़ती लाली
        पत्ती पत्ती बिखरा
        सुर्ख गुलाब।

Saturday, May 17, 2014

मेरी दुआएँ-

डॉ हरदीप सन्धु के जन्म दिन पर  
1
मेरी दुआएँ-
दु;खों की आँच कभी
पास न आए
2
घाटियाँ लिखें
हरे घास -पन्नों पे
फूलों की कथा
3
बनों  सूरज
सपनों में मन  का
उजाला भरो ।
-0-


Wednesday, May 14, 2014

शगुन


          छिंदा जब भर जवान हुआ तो उसकी शादी का भागों वाला दिन आ गया। उसके विवाह के सभी शगुन उसकी माँ ने अपनी जेठानी दलीपो से ही करवाए। छिंदे की शादी के बाद दलीपो कुछ उदास सी रहने लगी। ऐसा लगता था कि जैसे कोई अनदेखा डर उसे अंदर से खाए जा रहा था। इसी तरह कई वर्ष बीत गए। उसे वह दिन याद आ गया जब नि:सन्तान दलीपो की झोली में उसके देवर ने अपने पहले बेटे को डालते हुए कहा, " भाभी आज से छिंदे को तू अपना पुत्र ही मान ले, यह अब तेरा ही है।" नम आँखों से छिंदे को आँचल लेते हुए दलीपो को लगा जैसे उसकी छातियों में भी दूध उतर आया हो। अब छिंदा भी अपनी ताई को बहुत प्यार करता और उसको बड़ी माँ से बुलाता।
           चार बरस के बाद जब छिंदे के घर में पहली बेटी ने जन्म लिया तो दलीपो की ख़ुशी संभाले नहीं संभलती थी।  वह ख़ुशी में इधर -उधर घर में घूम रही थी। दलीपो देसी घी के लड्डू पूरे गाँव में बाँटते हुए सभी को कह रही थी , " अरी बहनोंमुझे तो कब का इस दिन का इंतज़ार थालड़का हो या लड़की, मेरे लिए कोई अंतर नहीं है ये तो रब की देन होते हैं - दोनों एक समान। अरी सबसे बड़ी बात तो ये है कि हमारे घर में लीक तो चली नहीं तो छिंदे की माँ ने मन ही मन मुझे कोसना था कि इस अभागन दलीपो के हाथों छिंदे के विवाह के शगुन हुए थे तभी तो इसके कोई औलाद नहीं हुई।'' 
डॉ. हरदीप कौर सन्धु