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Sunday, October 5, 2014

रौशनी की किरण

डॉ हरदीप कौर सन्धु

सर्द दिन…… थर-थर काँपती धूप  ....... मगर गुलाबी धूप के टुकड़ों को उसकी मीठी दोस्ती -संग निभाते मेरा अन्तर्मन असीम ख़ुशी से भर जाता। उससे जुड़ी दिली साँझ मुझे ख़ूनी रिश्तों से भी अनमोल लगती।  वह अक्सर दूधिया हँसी हँसती मुझे चाव से मिलती। आज किसी अलौकिक प्रसन्ता के उल्लास से भरकार  उसने कहा, " जल्दी ही एक नन्हा फ़रिश्ता मेरी झोली में आने वाला है।" उसी पल स्वाभाविक रूप से मेरा निजी अनुभव बोला," तेरा खिला माथा  तथा चेहरे का नूर तेरी कोख में पलने वाली नन्ही परी के आने की हामी भरता है। "

           छन-छन करता समय अपनी चाल चलता रहा और नन्हे फ़रिश्ते का अपनी माँ की कोख का गुलाबी सफर अब अन्तिम पड़ाव पर है। गुनगुनी  फागुनी धूप ,आज फिर हमारी मुलाकात हुई।  कुछ महीने पहले अनुमानित बात पर उसने पक्की मोहर लगाते हुए कहा, " सच  हाँ  सच में ………… एक नन्ही परी हमारे घर आने वाली है !" नई टैक्नॉलोजी के ज़माने में सब कुछ पहले से ही मालूम हो जाता है।

              आज ऐसे लगा जैसे उसके मन के मौसम में फूलों जैसी रस -भीनी महक बिखर गई हो। बहार जैसे खिलते हुए किसी अलौकिक उमंग में भरते हुए  उसने बड़े चाव से अपनी सुंदर परी के स्वागत की पहले से की हुई तैयारी को मेरे सामने लाकर बिखेर दिया। कहीं स्वयं खरीदी छोटी -छोटी गुलाबी फ्रॉक तथा मौजे तो कहीं सात समंदर पार से ऊनी धागों में बुना हुआ भेजा दादी -नानी का मोह-भीगे बचकन्ने। अपने पति की लाई हुई प्यारी सी गुड़िया जब उसने मुझे दिखाई तो लगा जैसे सच में ही दूधिया हँसी से आँगन भर गया हो। शायद वो इस गुड़िया को देखकर अपनी लाडो का चेहरा प्रतिदिन अन्तर्मन में देखती  है।

            ……… आने वाली रौशनी की किरण जैसी परी को मन ही मन में आज भागभरी कहने को मेरा मन कर आया।



खुली खिड़की

रौशनी की किरण

देखूँ आँगन।       

       
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