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Wednesday, December 24, 2014

सोच अपनी -अपनी (लघुकथा)

कमल  अपने पति के साथ पीलिए से पीड़ित अपनी तीन दिन की बच्ची को लेकर सरकारी अस्पताल आई थी। डाक्टर ने जब खून बदली का मशवरा दिया तो उनकी चिंता और बढ़ गई। ज़ेरे इलाज दो और बच्चों के साथ उनकी बच्ची को भी इनक्यूबेटर में रखा गया।  कमज़ोरी के कारण कमल बहुत अस्वस्थ नज़र आ रही थी। निक्की की बीमारी उसकी पीड़ा को और बढ़ा रही थी। । वह दूर बैठी इनक्यूबेटर में लेटी निक्की को व्याकुलता से टकटकी बाँधे देखे जा रही थी।
           अचानक निक्की ने अपनी चादर उतार दी। जैसे ही कमल ने ठीक करने के लिए अपना हाथ बढ़ाया उसकी चीख निकल गई। चेहरे पर फैली पीड़ गुस्से में बदल गई। अगले ही पल उसने निक्की को बाहर निकालते हुए पूछा , " इन दोनों बच्चों के साथ कौन है ? बाहर निकाल लो अपने बच्चों को , इतने ताप में रखकर हमने अपने बच्चों को झुलसाना नहीं है।" शोर सुनकर अस्पताल का स्टाफ़ आ गया। जाँचने के बाद मालूम हुआ कि तकनीकी ख़राबी के कारण इनक्यूबेटर का तापमान ज़रूरत से कई गुना ज़्यादा बढ़ गया था।
           "शुक्र है प्रभु का, आपके लड़के के साथ हमारे लड़के की भी जान बच गई," दूसरे बच्चे के साथ आई दादी  बोली। " हमारी तो लड़की है," कमल ने धन्यवादी शब्दों को स्वीकार करते हुए दादी की शंका दूर की।
 

" अरे आप लड़की के लिए इतनी चिंता में डूबे सुबह से दौड़ -धूप कर रहे थे। मुझे लगा लड़का होगा। "-दादी का मुँह खुला का खुला रह गया।

डॉ हरदीप कौर सन्धु 


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